1947- 48 जंग में कश्मीर के रक्षक

साल 1947 भारत देश के काफी त्रासदियों से भरा रहा था। 1947 में एक तरफ आजादी की लहर दौड़ रही थी वही दुसरी तरफ विभाजन का दर्द भी था। उसी साल 21 अक्टूबर को पाकिस्तानी कबिलियो ने पाकिस्तानी सेना के समर्थन से कश्मीर पे हमला करा था। अचानक हुए इस हमले से कश्मीर की हालत देख राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी थी। भारत ने मदद के लिए विलय की मांग करी थी और राजा हरी सिंह ने कश्मीर को बचाने के खातिर विलय के प्रस्ताव को मानना पड़ा। जैसे ही राजा हरी सिंह का और भारत का विलय का समझौता हुआ उसके बाद भारत ने अपनी सेना कश्मीरी भेजी कबायलियों को हरा उन्हें कश्मीर से भार करने को। इस जंग में कई लोगो ने एहम भूमिका निभ्याई थी 

ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह


ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह कश्मीर आर्मी के प्रमुख थे इनकी भूमिका इस जंग में काफी एहम रही है। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने बहादुरी की एक तस्वीर सामने रखी थी। राजा हरि सिंह के आधेश के बाद 150 सैनिकों ने बहुत कम हथियारों के साथ भी पुरी पाकिस्तानी सेना को 4 दिन तक रोक कर रखा था। 
उन्होंने अपना कर्तव्य बहुत बखूबी निभाया दुश्मन के लागतार हो रहे हमले से घायल हो कर भी उन्होंने हार नही मानी और कश्मीर की सुरक्षा के लिए लड़ते रहे। स्वतंत्र भारत के पहले महावीर चक्र धारक ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह 27 अक्टूबर को शहीद हो गए थे। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को आज भी लोग 'कश्मीर का रखवाला' नाम से याद करते है। 

मेजर सोमनाथ शर्मा


मेजर सोमनाथ शर्मा भारत के परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने इस जंग में काफी साहस दिखाया और दुश्मनों को धूल चटाई। मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बदगम का मोर्चा संभलने को मिला था। 3 नवंबर को सूरज की किरण से पहले मेजर और टुकड़ी वाह पहुंच चुके थे और अपनी पोजीशन होल्ड कर ली थी। 
कुछ समय के बाद दुश्मनी सेना ने उन्हें 3 तरफ से घेर लिया था और गोला बारी मैं टुकड़ी के काफी जवान शहीद हो गए थे पर घायल होने के बाद भी मेजर सोमनाथ शर्मा ने हार नहीं मानी और वो लड़ते रहे। थोड़े समय बाद जहा उन्होंने होल्ड करा था वह एक एयर मिसाइल आ गिरी और उस विस्फोट मैं वो शहीद हो गए।

नाईक यदुनाथ सिंह


नाईक यदुनाथ सिंह एक वीर और रणनीतिज्ञ जवान थे उन्होंने उस समय अपनी चौकी को 3 बार दुश्मन के हमले से बचाया था। नाईक यदुनाथ सिंह तैनधार की एक चौकी की कमान संभाले थे वहा सैनिकों की मात्रा बहुत कम थी मात्र 9 सैनिक चौकी की रक्षा कर रहे थे। पर जब दुश्मन ने वहा कब्जा करने का सोचा तो नाईक यदुनाथ सिंह ने अपनी हाजिर दिमागी दिखा उन्हें कन्फ्यूज कर भागा दिया।
6 नवंबर 1948 को चल रहे इस हमले में उनके सभी सैनिक घायल थे तो दूसरी बार जब हमला हुआ तो उन्होंने खुद गन उठा फायरिंग कर दुश्मनों को भगाया पर अगले हमले से लड़ने के लिए वो अकेले रह गए थे। फिर भी उनका जोश और जस्बा कम नहीं हुआ और उन्होंने दुश्मन को मुंह तोड़ जवाब दिया। पर इस बार गोली उनके भी सिर पे आ लगी और भारत माता का एक और वीर शहीद हो गए। नाईक यदुनाथ सिंह भारत के 4 परमवीर चक्र धारक थे।


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